नाग पुजा

भारत देश कृषिप्रधान देश था और है। सांप खेतों का रक्षण करता है, इसलिए उसे क्षेत्रपाल कहते हैं। जीव-जंतु, चूहे आदि जो फसल को नुकसान करने वाले तत्व हैं, उनका नाश करके सांप हमारे खेतों को हराभरा रखता है।


महाभारत, रामायण से लेकर उपनिषदों, पुराणों और कई मिथक ग्रंथों में नागों को देवता के रूप में मान्यता प्राप्त है। हिंदू धर्म में मान्यता है कि पृथ्वी शेषनाग के फन (सिर) पर टिकी हुई है। मान्यता है कि जैसे-जैसे पृथ्वी पर पाप कर्म बढ़ते हैं, शेषनाग क्रोधित होकर फन हिलाते हैं जिससे पृथ्वी डगमगा जाती है। इसी पुरातन किंवदंती के कारण नाग को देवता समझ कर पूजा जाने लगा। वैसे तो व्यावहारिक रूप में सर्प सम्पूर्ण पृथ्वी पर मौजूद हैं। सागर से लेकर रेगिस्तान तक, पर्वत से लेकर मैदान तक सर्प जाति प्रकृति और मानव के संबंधों की अहम कड़ी है। 

हिंदू धर्म ग्रंथों में भी नाग जाति का संबंध अनेक रूपों में अलग-अलग देवी-देवताओं के साथ बताया गया है। नाग वेदों से पहले के देवता हैं। नाग देवता का वर्णन ऋग्वेद में भी मिलता है। नाग पूजन का प्रचलन प्राचीन काल से चला आ रहा है। 

परन्तु  नाग की पूजा करना व्यर्थ है इनका धर्म ग्रंथों में कोई आधार नहीं है हमारे धर्म गुरुओं में व्यर्थ ही मूर्ख बनाए हुए हैं हमारे भारतवर्ष में नाग पंचमी के दिन नागों को दूध पिलाया जाता है उनसे मंगल की कामना की जाती है परंतु यह सब पाखंड है इनका अध्यात्म से कोई लेना देना नहीं है यह केवल पाखंडी गुरुओ द्वारा धन अर्जन का साधन है

 हिंदू मुस्लिम सिख ईसाई चाहे किसी भी धर्म की धार्मिक किताबें हो उनमें केवल एक ही परमात्मा का प्रमाण मिलता है जो कि कबीर साहिब हैं गीता पुराण बाइबल कुरान शरीफ गुरु ग्रंथ साहिब आदि धर्म ग्रंथ किताबों में ढेरों प्रमाण है कि कबीर परमेश्वर है और वही सब का सृजन हार है

 अधिक जानकारी के लिए पढ़ें ज्ञान गंगा पुस्तक या फिर जीने की राह पुस्तक या साधना चैनल पर शाम 7:30 से संत रामपाल जी महाराज के मंगल प्रवचन सुनाएं जिससे आपको वास्तविकता का ज्ञान होगा





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